Saturday, 24 November 2012
वैयक्तिक सामाजिकता
कहने का अर्थ ये है कि लोगों के बीच संवाद की
कमी नहीं है। और सबको पता है कि संवाद से संबंध बनता है और संबंध से समाज। संवाद? …। इस व्यस्तता भरी और भाग-दौड़ वाली जिंदगी में संवाद। ऐसे
कैसे..। लेकिन यही वो बात है जो मेरी इस पूरी बकवास में सबसे मार्मिक है। संवाद। हाँ..।
एक कहावत है न ‘मैं साँस लेता हूँ तेरी खुशबू आती है,’ वैसा ही कुछ। हवाओं
में है संवाद। इसे कुलीन भाषा में ‘आन एयर’ कहा जाता है। किसी ने इसको ‘वरचुअल’ भी कहा है। विश्वास
करिये दोनो अलग नहीं हैं। लोगों ने संवादहीनता की स्थिति को आगे बढ़कर नकार दिया
है। अब लोग उस पत्रों के जमाने वाले कागज में लिपटी बनावटी भावुकता से ऊब चुके
हैं। रिंग रिंग रिंगा ही अब इनकी सच्चाई है और तत्कालिकता इनका सिद्धान्त। इसके
लिए विषय की कमी की चुनौती को शायद किसी सूचना क्रान्ति ने पहले ही खत्म कर दिया
था।..... आखिरकार मैने लाख तर्क देकर ये
तो सिद्ध कर ही दिया कि लोगों के बीच संवाद है। तो आगे बढ़ें ?
चुकि संवाद
से हमलोग आगे बढ़ चुके हैं तो अब समाज की बात करनी ही पड़ेगी। समाज भी स्थापित ह्आ
है, एकदम नयी तरह का। हवाई समाज। आप अगर कहना चाहते हैं तो कह सकते हैं ‘वरचुअल सोसायटी’। इस नये समाज की विशेषता है वैयक्तिक सामाजिकता। इसका अर्थ ये
है कि इस सामाजिकता में किसी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर कोई असर नहीं पड़ता। और
भी बहुत कुछ पर यहां इसके लिए जगह नहीं है(जैसाकि प्राय: महान लेखक करते हैं)।
काल्पनिकता और आक्रामकता इसकी अन्य विशेषतायें हैं। यहां काल्पनिकता मध्ययुगीन
अर्थों में नहीं, बल्कि शुद्ध इक्किसवीं सदी के संदर्भों में लिखी गई है, तो
यह घोड़े पर सवार होकर नहीं आधुनिक तकनीक पर सवार होकर चलती है। आक्रामकता तो किसी
भी नयी-नयी स्थापित चीज के आवश्यक है ही। इससे पहले से उपस्थित चीजों को हटाने में
सरलता होती है।
तो... लोग
सामाजिक हुए हैं और उनके पास गति भी है और आक्रामकता भी। अब इसीके सहारे ये लोग
अपनी नियती को पा लें तो क्या आश्चर्य। भले ही लोग ये कभी न सोचें कि ये आदम जात
जा कहां रहा है। इसकी चिंता भी क्यों.. आखिर सुदूर भविष्य में देखता भी कौन है। वैसे
भी कहीं न कहीं तो ये पहुंचेंगे ही। सब पहुंचते हैं। इसमें जो बाधक बन सकता है वो
है ठहराव। थोड़ी देर का ठहरना सोच के प्रेरित करता है। और यह खतरनाक है। लेकिन..
मुझे तो लगता है कि इससे भी इन्हें कोइ असर नहीं पड़ेगा। इस सदी के लोग तो इतने
अधिक सामाजिक हैं कि एक क्षण ठहर कर खुद के बारे में नहीं सोचते, तो ये पूरी आदम
जात के लिए कैसे सोचेंगे। मैं तो निश्चिंत हूं। ऐसा कोई भी खतरा किसी निकट भविष्य
में दिखता नहीं। कोई भी ठहराव इनके सोच को प्रेरित करेगा ऐसा लगता नहीं।
है न
हार्दिक खुशी का बात। तो फिर चला जाय। माहौल थोड़ा गरम है। कल ही किसी को फाँसी पर
चढ़ाया गया है। अब इसपे बहुत सारी बातें होंगी। लोग कितना कुछ कहेंगे.. क्या-क्या
बोलेंगे। इसके बहुत सारे तकनीकी पहलुओं पर भी चर्चा होगी ही। कुछ ऐसी बातें होंगी
जो पहले से चली आ रहीं हैं पर अभी ठंडी हो गयी हैं। याद है न अभी कुछ ही दिन पहले
जब शायद कोई टाईगर मरा था, तब लोगों की ये सामाजिकता कितनी वाचाल हो उठी थी।.....
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