कितनी बार ढ़ली हैं शामें
पत्ते-पत्ते से रिस कर
तुमने झुक कर लेकर मिट्टी
छेड़ दिया है धरती पर
और अब गंध भरी जाती है
पसराती सी आंगन में
एक ढलान सी फिसलन जैसे
सरक गई है जीवन में
जब धीरे से एंड़ी अपनी
तुमने मुड़कर सरकाई
धूसरित होकर, बेवश होकर
रात बेचारी घिर आई
अब उन्माद बचा भी हो तो
कैसे उसको तार करें
शाम -ढ़ले की जल्दी से
हम किसका उद्धार करें
तुम इतना कुछ कर देती हो
मेरी कविता में आकर
थोड़ा तो कुछ बदलेगा ही
इससे बाहर भी जाकर
बाहर जाकर क्या करना है
इतना मैने कब जाना
मैं तो बस इतना कहता हूँ
तुम थोड़ा रूक के जाना
पंकज मिश्रा
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